‘पेरेंटिंग’ और ‘परवरिश’ आखिर होती क्या है यह?

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मेरी बड़ी बिटिया १५ साल की है और छोटी ९ साल की दोनों की उम्र में इतना फासला है कि एक ही समय पर मुझे दो अलग-अलग रोल प्ले करने पड़ते हैं ।

‘पेरेंटिंग’ और ‘परवरिश’ होती क्या है यह? कुछ समय पहले टीवी पर एक नाटक आया करता था परवरिश के नाम से । बड़ा ही सही नाटक था अपने नाम को सार्थक करता हुआ। दो लड़कियां ,दो अलग माहौल ,दो अलग समाज के तबकों से निकले हुए उनके मम्मी पापा, दो अलग सोच साथ ही दो अलग तरीके परवरिश के ।

 

common क्या था ? था तो बस दोनों के ही पेरेंट्स या अभिभावक का ये सोचना की कैसे हम अपने बच्चों की सही परवरिश करें  कैसे हम उन्हें सही गलत की पहचान करना सिखाएं, कैसे हम उन्हें अच्छे संस्कार दें जिससे वो आगे बड़े व् कुछ बनकर दिखाएँ ।

क्या है परवरिश…

मेरे ख्याल से यही परवरिश है। इसके कुछ बंधे बंधाये नियम कायदे कानून नहीं हैं। हर बच्चा अलग होता है। हर बच्चे के सोचने का नजरिया अलग होता है ।हमे सिर्फ अपने बच्चे के नज़रिये को समझ कर बस उसी के अनुसार एक्ट करने की जरुरत होती है। में खुद भी दो प्यारी सी बच्चियों की माँ हूँ। मेरी बड़ी बिटिया १५ साल की है और छोटी ९ साल की दोनों की उम्र में इतना फासला है कि एक ही समय पर मुझे दो अलग-अलग रोल प्ले करने पड़ते हैं ।

बड़ी के साथ दोस्त बनना पड़ता है तो छोटी के साथ टीचर। बड़ी के पास ढेरों सवाल हैं जिनके जवाब वो खुद ही ढूंढना चाहती है, मेरा जवाब तो पुराने ज़माने का लगता है। उसकी एक सपनो कि दुनिया है जिसमे सब कुछ बड़ा फिल्मी सा है। उसे समय समय पर सपनो कि दुनिया से यथार्थ कि दुनिया में वापस लाना पड़ता है पर इस तरह से कि उसे चोट भी ना लगे ।

उसे वास्तविक दुनि यां कि सारी अच्छी बुरी बातों से अवगत करना है पर इस तरह कि उसे लगे कि ये सब उसने अपने आप किया है ।अरे उसके पास उसके खुद के भी तो अनुभव होने चाहिए नहीं तो आगे क्या शेयर करेगी ।

मेरा मानना है कि हमें अपने बच्चों को खुला आसमान देना चाहिए उड़ने के लिए पर उससे पहले उनके पंख मजबूत करना भी तो जरुरी है। शुरुआत में गिरेंगे तो थोड़ी चोट तो लगेगी पर आगे के लिए वो तैयार हो जायेंगे । ये भरोसा उन्हें हमेशा हम पर होना चाहिए कि हम as a parent हमेशा उन के साथ हैं । उन्हें संभालने के लिए पीछे खड़े हैं ।ये भरोसा पाना ही हमारी चुनौती है ।

कभी ना थकने वाला कभी ना ख़तम होने वाला काम …

छोटी वाली उसके उलट है, उसे हर सवाल का जवाब मुझसे ही चाहिए। उसके सवालों के जवाब देते देते तो में ही कहीं खो सी जाती हूँ। फिर से उसके साथ बच्चा बनना पड़ता है कितनी बार उसकी बातें उसके तरीके से समझने के लिए। कभी टीचर बन कर उसे डाँटना भी पड़ता है आखिर अच्छी बातें भी तो सीखना है। इतनी सारी खुराफातें इनके जादुई दिमाग के पिटारे में होती हैं कि मत पूछिये पर परवरिश करने वाले को सब कुछ पहले से समझना पड़ता है साथ में उसको समझाने के लिए भी खुद तो तैयार रखना पड़ता है जैसे सिपाही बॉर्डर पर तैयार रहते हैं।

वो जब हर बात पर पूछती है कि माँ आप को सब कुछ पहले से ही कैसे पता चल जाता है ? तब में उलटे उससे पूछती हूँ कि माँ कौन है? इस उम्र के बच्चों के साथ थोड़ा सा तो स्ट्रिक्ट होना ही पड़ता है आखिर डिसिप्लिन भी तो सीखना है। कभी प्यार से कभी डांट कर तो कभी समझा कर उससे अपनी बात मनवानी पड़ती है ।

मेरे अनुसार parenting is a daily improvising process, a never ending journey, every day is a new learning. कभी ना थकने वाला कभी ना ख़तम होने वाला, हर दिन आपको कुछ नया करना पड़ता है अपने बच्चे को कुछ नया सीखने के लिए। आज अगर कोई कम्पटीशन जीत ली है तो समझाना है कि सिर्फ एक जीत काफी नहीं है मंजिल पाने के लिए, खुश हो कर रुक नहीं सकते, आगे कि चुनोतियों के लिए भी तैयार होना है ।

वहीँ अगर बच्चा हार कर भी आता है तो नाराज होने कि जगह उसे ये समझाना है कि एक हार से दुनियां ख़तम नहीं होती बल्कि हार ही तो अगली जीत की सीढ़ी है। बड़े लोग कहते हैं की अपने बच्चे को पांच साल तक खूब प्यार करो, ६ साल से १३ साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो,१४ साल से उनके मित्र बन जाओ। ठीक ही कहा है में भी मानती हूँ और फिर परवरिश तो सीखते सीखते ही आती है ।

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Source: theindusparent

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